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जिस शजर की हवाओं से पाती हैं ज़िन्दगी पतंगें  उसी से  लटक के करेंगी एकदिन ख़ुदकुशी पतगें  - फ़क़ीर                                      *शजर - tree 

तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो एक दरख्त था                      जिसकी मीठी छांव ओढ़कर एक तन्हा तीखी दोपहर साथ देखते रहे डाल - डाल चढ़ते हुए ख़्वाबों को पाते बुलंदियां सर झुकाये आज भी याद करता है तुम्हें तुम्हें याद हो कि न याद हो ----------- 1. वो जो एक झील थी जिसके ठहरे शीशे में कभी हम देखते थे आईना पानी के ऊपर थी बनी तस्वीर इक तिरी-मिरी रात को थाली सी सजी जो परोसती थी पूनम का चाँद कल-कल की ज़ुबान में पुकारती रहती है तुम्हें तुम्हें याद हो कि न याद हो ----------- 2. हवेली की वो बूढी सी छत बेवा सी अकेली सी छत छुपा लेती थी हमें हिफ़ाज़त की आगोश में सीढ़ियां बताती थी जिसकी आ रहा है इधर कोई वो सीढ़ियां कब से ख़ामोश हैं काश फिर देख पाती तुम्हें तुम्हें याद हो कि न याद हो ----------- 3. * दरख्त – TREE  **(मोमिन सा'ब का एक मिसरा उड़ाया है)

बयां -ए- जानां

वो जब बोलता है तो बोलता है कुछ ऐसे अंदाज़ में… जैसे शबनम के ढलकने का हो सलीका हर लफ्ज़ लम्स हो पहली कली का जैसे कपास की रूई उड़ी हो लफ्ज़-लफ्ज़ बुलबुले की लड़ी हो ------ 1 वो जब बोलता है तो बोलता है कुछ ऐसे अंदाज़ में… जैसे अगर अल्फ़ाज़ टपक जाएं तो उन पर मक्खियां भिनभिनाएं चाय में अगर शक्कर कम हो तो उसमें बस उसके लफ्ज़ ही मिलाएं डायबिटीज के मरीज़ ज़रा फासला से ही उससे राब्ता बढ़ाएं ------- 2 वो जब बोलता है तो बोलता है कुछ ऐसे अंदाज़ में… हर बार हौले से मानो कुछ यूं कहता है बात- बात पे जैसे I LOVE YOU कहता है ज़ख्मों की मरहम से रफू करता है चला भी जाए तो देर तक मुझसे गुफ्तगू करता है वो जब बोलता है तो बोलता है कुछ ऐसे अंदाज़ में… 3 Meaning: शबनम – Dew  ढलकने – Drip  सलीका – Style  लम्स – Touch अल्फ़ाज़ – Words राब्ता – contact रफू – Patch 
चलो न ख़ाक़ छानें  छुपी चिंगारियां चुनें  सबको मिलाकर एक चराग़ बनाएंगे रात की छाती पर रख आयेंगे चराग़, जो सूरज का परचम लहराये चराग़, जो हवाओं में भी हरदम लहराये चराग़, जिसमें तूफ़ानो की दहशत न हो चराग़, जले, मगर जलाने की हसरत न हो चराग़, जो हरदम रास्ता दिखलाये चराग़, जो रौशनी की ख़ुशबू फैलाये चराग़, जो खोये हुए का सहारा बन जाए चराग़, सभी सिंदबादों का ध्रुव-तारा बन जाए चलो न दिल की बात मानें चलो न ख़ाक़ छानें...
बड़ा जादू है तेरे इस शहर में चाँद दिखा मुझे भरी दोपहर में आ दिखा दूं कैसा होता है ख़ुदा झाँक तो मेरी आईने सी नज़र में तुम्हें याद करेंगे तुमसे फ़ुरसत पाकर ख्वाब रात में तेरा ख्य़ाल सहर में रात भर तड़पा, करवटें बदली तेरी याद का कंकड़ मेरे बिस्तर में धूप भी जिसके सामने लगे हैं सांवली हुनर का हुस्न है, हुस्न के हुनर में एक दूसरे के लिए बन गए हैं दीवार कई घर मिले मुझे एक ही घर में साथ चलने से ही कोई साथ नहीं होता हमसफ़र नहीं है, साथ हैं हम सफ़र में *सहर – Morning
आइने में इक अजनबी को देखके सिहर गए अपने ही अक्स से आज वो कैसे डर गए शेख की नसीहत 'सुकूं मिलेगा मस्जिद जा' किया मस्जिद का *रुख़ और तेरे घर गए वो  परिंदा  अब  न  उड़  सकेगा  *आईंदा पेट  की  सुनी  तो  उसके  *पर  गए उन  पर  इल्ज़ाम  कैसे  लगाओगे  मियाँ नज़रों से कहकर जो जुबां से *मुकर गए हमें  था  रिश्ते  का  ख़्याल  इस  क़दर सुनते  रहे, चुप  रहे, हाँ  हम  डर  गए राम -ओ- रहीम तेरे एक घर के झगड़े  में कितने बदनसीबों के घोंसले बिखर गए बुलंदी  है  शुरुआत  गिरने  की  फ़क़ीर सर  पर  चढ़े  जो  नज़रों  से  उतर  गए *रुख़ - turn towards *आईंदा - In future *पर - Wings *मुकर - Denied
मुसीबतों से किया वादा हमने निभाया है  हवाओं आओ, तुम्हारे *रुख़ चराग़ जलाया है  हार गए हम उसपर अपना दिल हार कर  वो भी कहाँ जीता, जिसने हमें हराया है  खंज़रों-से पत्थरों के *मुक़ाबिल पानी को कर दिया दरिया ने अपना हौसला, ऐसे आज़माया है इस खेल में हारते ही हैं सब, जानता हूँ मैं जानबूझकर, दांव पर, सबकुछ लगाया है हवा भी है तरफ़दारी की *तलब की मारी इक चिंगारी जलायी तो एक चराग़ बुझाया है एक लकड़ी के घर की हवस में तूने इंसां न जाने कितने परिंदों का घर गिराया है उस मखमल से बदन का हौसला तो देखिये बबूल की *नेजों पे जिसने घोसला सजाया है देख पत्थरों के दिल पर पानी की *नक्काशियां 'फ़क़ीर' ने साहिल पर रेत का घर बनाया है * रुख़ -  Towards * मुक़ाबिल -  In confrontation * तलब -  Wish * नेजों -  Spear * नक्काशियां -  Carving