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जिस शजर की हवाओं से पाती हैं ज़िन्दगी पतंगें 
उसी से  लटक के करेंगी एकदिन ख़ुदकुशी पतगें 

- फ़क़ीर                                      *शजर - tree 

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हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
वो बूढा घर के बाहर जिसे सुलाया गया उसी बूढ़े के पेंशन से किराया गया कि दहशतगर्द क्यों मुस्लिम ही होते हैं डरे मन को डरे जन से डराया गया उसे बरअक़्स, मेरे ही, किया सबने मुझी को मुझसे फिर यूं  आज़माया गया बड़ा है मतलबी जग, माँ जिसे बोला कि दसवें दिन उसी माँ को बहाया गया नहीं धुलता था पानी से किसी सूरत  लहू से उस लहू को फिर मिटाया गया छुआ कुम्हार  ने,  था जात का छोटा उसी के बने घड़े से  फिर  नहाया गया