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पैरों में बाँध के सफ़र, चलो कहीं दूर चलें खोजें कोई लापता डगर, चलो कहीं दूर चलें दीद की सरहदों तलक तन्हाई हों जहाँ नजारों से भर लें नज़र, चलो कहीं दूर चलें बहुत थक गया है, आराम चाहिए उसे भी वक़्त भी सुस्ताये जहाँ रुककर, चलो कहीं दूर चलें दुनिया, ये दुनियादारी; जैसे कोई लाईलाज बीमारी हो दुनिया जहाँ दुनिया से बेहतर, चलो कहीं दूर चलें महफ़िल हो फ़िज़ा जहाँ, पर्वत करे शायरी सफ़ेद स्याही से नीले पन्ने पर, चलो कहीं दूर चलें आवारगी होगी सफ़र अपना, और ग़ुमशुदगी मंज़िल खो जाने का सीखें हूनर, चलो कहीं दूर चलें वही कि जहाँ संगदिल पिघल, बनतें हैं दरिया गुनगुनाते रहते हैं सफ़र भर, चलो कहीं दूर चलें
तुम जीते और मैं हारा, चलो क़िस्सा खत्म करें क्या टूटा दिल बस हमारा, चलो क़िस्सा खत्म करें तुम तौलते हो इंसान की औक़ात दौलत मैं, और ईमां है पैमां हमारा, चलो क़िस्सा खत्म करें मिलाने को तो यूं मिलते हैं ज़मीन-ओ- आसमां भी बस किनारे को न मिला किनारा, चलो क़िस्सा खत्म करें माना कि हूँ कमज़ोर, गिरेबां पकड़ती है दुनिया मेरी तुम्हारे क़दमों में है जग सारा, चलो क़िस्सा खत्म करें तुम्हारी बददुआ क्यूँ हुई बेअसर हमसे पूछो, मरके कोई मरता है दोबारा, चलो क़िस्सा खत्म करें चल ऐ दिल कि चलें आवाज़ के सरहदों से दूर हम मुड़के न देख किसने पुकारा, चलो क़िस्सा खत्म करें ख्वाहिश है कि पूरी हो बस तुम्हारी ख्वाहिश फ़क़ीर बन जाएगा टूटा तारा, चलो क़िस्सा खत्म करें
तुम कहते हो कि  वो तुम्हारा साया है क्या कभी उसे अँधेरे में भी आज़माया है बहार हों तो शाखों से लिपट जातें हैं गुल पतझड़ में भला किस पत्ते ने साथ निभाया है यार बहुत कड़वा है ज़िन्दगी का ज़ायका कहीं तुमने इसमें सच तो नहीं मिलाया है एक ख़्वाब  घर का पूरा करने के वास्ते कई बार ख़ुदको बुनियाद तले दफनाया है हरेक बूँद के लिए मुझे तडपाने वाले ने सुपुर्द-ए-ख़ाक से पहले मुझको नहलाया है यहाँ से ये ग़ज़ल मेरे वालदैन (PARENTS) के नाम : उनके थप्पड़ का मलाल नहीं, ख़ुशी है मुझे नम आँखों से रातभर माँ ने सहलाया है चौंककर जागना फिर उसकी बांहों में दुबक जाना मेरे बुरे ख्वाबों ने कई रात उन्हें जगाया है तेरे हासिल में अगर वो शामिल नहीं है तो तू जन्नत भी पा ले तो क्या पाया है ख़ुदा को नहीं देखा लेकिन यकीं है 'फ़क़ीर' ख़ुदा  ने  उन्हें  ख़ुद   सा  बनाया  है      

आओ न

ख़्यालों से नहीं दरवाज़े से कभी आओ न रू-ब-रू आकर ऐ ख़्वाब मेरे ख़्वाब से कभी जगाओ न कभी यूंही आओ छत पे तुम अमावस को पूनम बनाओ न कर दो सूरज को मद्धम कभी कभी रुख़ से पर्दा हटाओ न कब तक रहोगी परछाईं बनके परछाईं को बदन बनाओ न ख़्यालों से नहीं दरवाज़े से कभी आओ न ......

वक़्त यहीं पे थम जायेगा

अपनी उँगलियों के नाज़ुक दस्ताने मेरे हाथों में रहने दो बेलफ्ज़ कर दो लब अपने आँखों को अब कहने दो मैं हूँ 'तुम', तुम हो 'मैं' चूम लूं मैं अब - लब अपने दो बहता लम्हा जम जायेगा वक़्त यहीं पे थम जायेगा ------- 1. इश्क़  में लज्ज़त आएगी लम्स को लम्स चखने दो साँसों की धीमी आंच पर मद्धम - मद्धम पकने दो दुनिया से छुपाके इश्क़ मिठाई दिल की आड़ में रखने दो बहता लम्हा जम जायेगा वक़्त यहीं पे थम जायेगा ------- 2. ओढ़ लूं तुमको सरापा मैं आगोश का कम्बल ढकने दो अपने सांचे में थाम मुझे तुम-सा मुझको दिखने दो खुद को रख दूं गिरवी मैं जो अपने पास रखने दो बहता लम्हा जम जायेगा वक़्त यहीं पे थम जायेगा ------- 3.

सुनो .....

सुनो ..... यूं हुस्न पे अपने इतना मत इतराओ ग़ैर की दौलत पर हक़  मत जताओ ये बताओ ..... कि किसने तुम्हारी जुल्फों को रंगा  था सावन के रंग में किसने निचोड़ कर काली घटाएँ भर दिया इनके अंग - अंग में किसने सिखाया इन्हें आबशार (झरने) सा ढलकना है कि  शरमाये जब चाँद बादल में बदलना है। ज़रा हाथ लगाकर देखो इनकी रंगत गवाही है इनकी रंगत कुछ और नहीं मेरे क़लम की स्याही है ... सुनो .....  यूं हुस्न पे अपने इतना मत इतराओ ग़ैर की दौलत पर हक़ मत जताओ तुम्हें क्या पता नहीं ..... जुल्फों के पीछे छिपा माहताब (चाँद) किसका है? इक जगता  हुआ सा ये ख्वाब किसका है? किन धडकनों की आरज़ू हो तुम किसकी इबादत-मज़हब-वज़ू हो तुम हरपल किसकी जुस्तजू हो तुम फिरभी , हरदम किसके रू -ब- रू हो तुम किसके लिए हर शय में हो, हर जगह हो किसकी शाम हो, शब हो, सुबह हो खुद से जो पूछो कि तुम क्या हो किसी के लिए जीने की वजह हो ....... कि अब इतना इतराओ नहीं राज़ -ए - दिल बता भी दो - 2 किसी की अमानत है ये अपना दिल...
मेरा दिल तुम्हें कुछ इस तरह ढूंढता है. जैसे कोई फ़क़ीर अपना ख़ुदा ढूंढता है. टटोलता है हाथों की लक़ीर अक्सर  अक्सर इक लापता का पता ढूंढता है. कभी ख़्वाब, कभी ख़्याल, कभी यादों में गुंजाइश  की  हर  जगह  ढूंढता  है. इसके दर्द की वजह तुम हो लेकिन पूछिए तो कहता है कि दवा ढूंढता है. तुम्हारी जुल्फों -  सी  शाम चाहता है ये, तुम्हारे  चेहरे - सी  सुबह  ढूंढता  है. तुम  हो  एहसास  की  ठंडी  पुरवायी, मगर ये पागल सूरत-ए- सबा ढूंढता है. काश कि झाँक पाता ये खुद में फ़क़ीर समझ जाता कि बे - वजह ढूंढता है.