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पैरों में बाँध के सफ़र, चलो कहीं दूर चलें
खोजें कोई लापता डगर, चलो कहीं दूर चलें

दीद की सरहदों तलक तन्हाई हों जहाँ
नजारों से भर लें नज़र, चलो कहीं दूर चलें

बहुत थक गया है, आराम चाहिए उसे भी
वक़्त भी सुस्ताये जहाँ रुककर, चलो कहीं दूर चलें

दुनिया, ये दुनियादारी; जैसे कोई लाईलाज बीमारी
हो दुनिया जहाँ दुनिया से बेहतर, चलो कहीं दूर चलें

महफ़िल हो फ़िज़ा जहाँ, पर्वत करे शायरी
सफ़ेद स्याही से नीले पन्ने पर, चलो कहीं दूर चलें

आवारगी होगी सफ़र अपना, और ग़ुमशुदगी मंज़िल
खो जाने का सीखें हूनर, चलो कहीं दूर चलें

वही कि जहाँ संगदिल पिघल, बनतें हैं दरिया
गुनगुनाते रहते हैं सफ़र भर, चलो कहीं दूर चलें





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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.

मदारी

अरे! हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरा पिटारा, है जग सारा, दुनियादारी हो तेरे इशारे का सम्मान करें ख़ुद हनुमान तुम मांगो भीख तेरे कब्ज़े में भगवान ईश का करतब इंसान और ईश इंसानी कलाकारी हो   हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! आस्तीन सा एक पिटारा सांप हम जै सा तुम्हारा सर पटके बार बार विष उगलने को तैयार न ज़हर उगल आज मत बन रे समाज काटने- कटने की ये बीमारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरे जमूरे- आधे अधूरे भूखे - नंगे , हर हर गंगे हाथसफाई के उस्ताद पर लगे कुछ न हाथ जीने के लिए जान लगाएं ज़ख्म से ज़्यादा कुछ न पाएं हवा खाएं साएं – साएं बचपन के सर चढ़ गयी ज़िम्मेदारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो!
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