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मेरा दिल तुम्हें कुछ इस तरह ढूंढता है.
जैसे कोई फ़क़ीर अपना ख़ुदा ढूंढता है.

टटोलता है हाथों की लक़ीर अक्सर 
अक्सर इक लापता का पता ढूंढता है.

कभी ख़्वाब, कभी ख़्याल, कभी यादों में
गुंजाइश  की  हर  जगह  ढूंढता  है.

इसके दर्द की वजह तुम हो लेकिन
पूछिए तो कहता है कि दवा ढूंढता है.

तुम्हारी जुल्फों - सी शाम चाहता है ये,
तुम्हारे  चेहरे - सी  सुबह  ढूंढता  है.

तुम  हो  एहसास  की  ठंडी  पुरवायी,
मगर ये पागल सूरत-ए- सबा ढूंढता है.

काश कि झाँक पाता ये खुद में फ़क़ीर
समझ जाता कि बे - वजह ढूंढता है.

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सागर से उसको इश्क़ साहिल से नहीं मछली डरे हासिल से मुश्किल से नहीं उसके नगर का तौर है हमसे जुदा घर घर जुड़े हैं हाय दिल-दिल से नहीं सूरज निकलते ही बुझा डाला दिया है बस चमक से इश्क़ काबिल से नहीं वो इश्क़ तो करता है पर शादी नहीं मैं शौक़ से डरता हूँ क़ातिल से नहीं हो बेबसी तो माफ़ है हर इक ख़ता झूठों से डरता हूँ मैं बातिल से नहीं