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वक़्त के चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाएंगी बस यही यादें हैं जो बाक़ी रह जाएंगी
उसके नाम में पोशीदा इक नशा है पी लूँ? ये तो तौहीन ए मयक़दा है

राष्ट्र और प्रेम

तेरे घने गेशूओं को अपने चेहरे पर बिखेरे हुए अपनी उन हसीं पलों में जो अब बस तेरे हुए सोचता हूँ कि इस हसीं पल में भी... कोई ग़रीब झोपड़ा जल रहा होगा कोई अमीर जलसा चल रहा होगा कुछ सोने में ढले हाथ आग में घी फेंक रहे होंगे एक झोपड़े की चिता पर ‘महल’ सर्द हाथ सेंक रहे होंगे ------------------------------------------------------------------------------------ तेरे मखमली बदन को बाहों में भरते हुए होंठों से तेरे जिस्म पर शायरी करते हुए मैं सोचता हूँ... मखमली खेतों में दरारें पड़ गयी होंगी खड़ी फसलें खड़े-खड़े सड़ गयी होंगी भूख ने किसान को चोर बनाया होगा चोरों ने मिलकर चोर-चोर चिल्लाया होगा फिर उस नक्सली को जब गोली मारी जाएगी देश से मुफलिसी की तभी ये बीमारी जाएगी ---------------------------------------------------------------------------------- बेबस सा पड़ा मैं तुमपर तुम मुझपर पड़ी निढाल सांसों में लग गयी गाठें खाल से चिपक गयी खाल कमाल ये कि मैं फिर सोचता हूँ.. अंधी अँधेरी खानों में रोशनी ढूंढ रहे होंगे मज़दूर अपनी-अपनी ताबूतों में उतरने को हैं जो मजबूर इन्हीं खानों में एकदिन वो जिंदा दफ़न हो जाएंगे बनके ब...
बिक रही है जो सरेबाजार किसी सामान की तरह तमन्ना थी कोई समझे उसे भी कभी इंसान की तरह मेरे ही माँ – बाप अब मेरे रिश्तेदार हो गए जाता हूँ अब अपने ही घर किसी मेहमान की तरह उसे याद करने से पहले करता हूँ *वुज़ू मैं और नाम लेता हूँ ऐसे, जैसे पाक *अज़ान की तरह इंसान है जब तक, उसका है इंसानों से *राब्ता बन जाएगा पत्थर, बनाया जो भगवान की तरह हालांकि कोई क़ीमत नहीं, पर वो बेशक़ीमती है ख़रीद नहीं पाया कोई उसे, उसके ईमान की तरह बारिश की दुआ मेरी, बन जाए न बददुआ कोई कुम्हार की तरह सोचूं कि सोचूं किसान की तरह इस तरह रहता हूँ इस शहर में ऐ फ़क़ीर! मुसलमां में हिन्दू, हिन्दुओं में मुसलमान की तरह *वुज़ू - Pious ritual *अज़ान - Prayer *राब्ता - Relation
मेरी अक़ीदत का  ये   मोजज़ा है  ज़बीं चूमे जो पत्थर वो ख़ुदा है

मदारी

अरे! हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरा पिटारा, है जग सारा, दुनियादारी हो तेरे इशारे का सम्मान करें ख़ुद हनुमान तुम मांगो भीख तेरे कब्ज़े में भगवान ईश का करतब इंसान और ईश इंसानी कलाकारी हो   हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! आस्तीन सा एक पिटारा सांप हम जै सा तुम्हारा सर पटके बार बार विष उगलने को तैयार न ज़हर उगल आज मत बन रे समाज काटने- कटने की ये बीमारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरे जमूरे- आधे अधूरे भूखे - नंगे , हर हर गंगे हाथसफाई के उस्ताद पर लगे कुछ न हाथ जीने के लिए जान लगाएं ज़ख्म से ज़्यादा कुछ न पाएं हवा खाएं साएं – साएं बचपन के सर चढ़ गयी ज़िम्मेदारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो!
इस ज़मीन को खुद में बसाने लगा है . वो छोटा बच्चा मिटटी खाने लगा है . कुछ लोग घर को रेत कर गए थे , वो पागल रेत से घर बनाने लगा है . बुश - लादेन , इज़रायल - फलस्तीन हमसफ़र हैं , वो   अख़बारी काग़ज़  के जहाज़ उड़ाने लगा है . इक तरफ इंसान बंट रहे हैं ज़ात ओ मज़हब में , इक तरफ वो आटे में बेसन मिलाने लगा है . गिरो , उठो , धूल झाड़ो , फिर बढ़ो , वो हमें चलने का सलीका सिखाने लगा है . कहीं बचपन को लग जाए न तजर्बे की नज़र , यह फ़िक़्र ऐ फ़क़ीर मुझे सताने लगा है .