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इस ज़मीन को खुद में बसाने लगा है.
वो छोटा बच्चा मिटटी खाने लगा है.

कुछ लोग घर को रेत कर गए थे,
वो पागल रेत से घर बनाने लगा है.

बुश - लादेन, इज़रायल -फलस्तीन हमसफ़र हैं,
वो अख़बारी काग़ज़ के जहाज़ उड़ाने लगा है.

इक तरफ इंसान बंट रहे हैं ज़ात मज़हब में,
इक तरफ वो आटे में बेसन मिलाने लगा है.

गिरो, उठो, धूल झाड़ो, फिर बढ़ो,
वो हमें चलने का सलीका सिखाने लगा है.

कहीं बचपन को लग जाए तजर्बे की नज़र,
यह फ़िक़्र फ़क़ीर मुझे सताने लगा है.

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सागर से उसको इश्क़ साहिल से नहीं मछली डरे हासिल से मुश्किल से नहीं उसके नगर का तौर है हमसे जुदा घर घर जुड़े हैं हाय दिल-दिल से नहीं सूरज निकलते ही बुझा डाला दिया है बस चमक से इश्क़ काबिल से नहीं वो इश्क़ तो करता है पर शादी नहीं मैं शौक़ से डरता हूँ क़ातिल से नहीं हो बेबसी तो माफ़ है हर इक ख़ता झूठों से डरता हूँ मैं बातिल से नहीं