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राष्ट्र और प्रेम



तेरे घने गेशूओं को
अपने चेहरे पर बिखेरे हुए
अपनी उन हसीं पलों में
जो अब बस तेरे हुए

सोचता हूँ कि इस हसीं पल में भी...

कोई ग़रीब झोपड़ा जल रहा होगा
कोई अमीर जलसा चल रहा होगा

कुछ सोने में ढले हाथ
आग में घी फेंक रहे होंगे
एक झोपड़े की चिता पर
‘महल’ सर्द हाथ सेंक रहे होंगे
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तेरे मखमली बदन को
बाहों में भरते हुए
होंठों से तेरे जिस्म पर
शायरी करते हुए

मैं सोचता हूँ...

मखमली खेतों में
दरारें पड़ गयी होंगी
खड़ी फसलें
खड़े-खड़े सड़ गयी होंगी

भूख ने किसान को
चोर बनाया होगा
चोरों ने मिलकर
चोर-चोर चिल्लाया होगा

फिर उस नक्सली को
जब गोली मारी जाएगी
देश से मुफलिसी की
तभी ये बीमारी जाएगी

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बेबस सा पड़ा मैं तुमपर
तुम मुझपर पड़ी निढाल
सांसों में लग गयी गाठें
खाल से चिपक गयी खाल

कमाल ये कि मैं फिर सोचता हूँ..

अंधी अँधेरी खानों में
रोशनी ढूंढ रहे होंगे मज़दूर
अपनी-अपनी ताबूतों में
उतरने को हैं जो मजबूर

इन्हीं खानों में एकदिन
वो जिंदा दफ़न हो जाएंगे
बनके बुनियाद का पत्थर
राष्ट्र-हित में काम आएंगे

ये जो चुपचाप मर रहे हैं
ज़िन्दगी के लिए ख़ुदकुशी कर रहे हैं

मैं सोचता हूँ कि...
अगर अदावत कर दें तो...

मैं सोचता हूँ कि...
अगर बग़ावत कर दें तो...

फिर सोचता हूँ कि
मैं इतना क्यूं सोचता हूँ
और तुम्हारे चाँद से चेहरे को
हथेलियों में ले चूम लेता हूँ

मैं सोचता हूँ कि... जाने भी दो फ़क़ीर

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