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मेरी अक़ीदत का  ये   मोजज़ा है  ज़बीं चूमे जो पत्थर वो ख़ुदा है

मदारी

अरे! हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरा पिटारा, है जग सारा, दुनियादारी हो तेरे इशारे का सम्मान करें ख़ुद हनुमान तुम मांगो भीख तेरे कब्ज़े में भगवान ईश का करतब इंसान और ईश इंसानी कलाकारी हो   हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! आस्तीन सा एक पिटारा सांप हम जै सा तुम्हारा सर पटके बार बार विष उगलने को तैयार न ज़हर उगल आज मत बन रे समाज काटने- कटने की ये बीमारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरे जमूरे- आधे अधूरे भूखे - नंगे , हर हर गंगे हाथसफाई के उस्ताद पर लगे कुछ न हाथ जीने के लिए जान लगाएं ज़ख्म से ज़्यादा कुछ न पाएं हवा खाएं साएं – साएं बचपन के सर चढ़ गयी ज़िम्मेदारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो!
इस ज़मीन को खुद में बसाने लगा है . वो छोटा बच्चा मिटटी खाने लगा है . कुछ लोग घर को रेत कर गए थे , वो पागल रेत से घर बनाने लगा है . बुश - लादेन , इज़रायल - फलस्तीन हमसफ़र हैं , वो   अख़बारी काग़ज़  के जहाज़ उड़ाने लगा है . इक तरफ इंसान बंट रहे हैं ज़ात ओ मज़हब में , इक तरफ वो आटे में बेसन मिलाने लगा है . गिरो , उठो , धूल झाड़ो , फिर बढ़ो , वो हमें चलने का सलीका सिखाने लगा है . कहीं बचपन को लग जाए न तजर्बे की नज़र , यह फ़िक़्र ऐ फ़क़ीर मुझे सताने लगा है .
जो दो आँखों में दो-दो जहां की ख़्वाहिश लिए चलता है  वो बूंद है जो ख़ुद में समंदर की गुंजाइश लिए चलता है

मंटो तुम मर जाओ

मंटो तुम्हें बुरी लत है लिबास उतार देने की पर नंगी जिस्मों पर लिबास ही कब था  तुम उधेर रहे हो खाल परत दर परत समाज की फट रही हैं नसें लहू जिस्म बनता जा रहा है लहू ढँक लेगा बदन लहू बन जाएगा कफन लाश पड़ी है 'आज' की मंटो तुम मरे नहीं हो लफ्ज़ दर लफ्ज़ मार रहे हो क़ातिल हो तुम उस क़ातिल से ज़्यादा जिसके हाथ में खंज़र था तुम ज़िंदा करते हो मुझे हर कहानी में अपनी ज़ुबानी में अपने मुताबिक बिछाकर चूहेदान बना के शाहदोले का चूहा लेकर फितरत बाज की मंटो क्या ये कोई बात है कि तुम हर शख्स को कर दो टोबा टेक सिंह या फिर बारिश में भीगा ज़ख़्मी सर पे ज़ख्म उठाए टिटवाल के कुत्ते सा जिसकी जीभ पहुँच नहीं रही ज़ख्म तक जिसके ज़ख्म से आ रही है बू छटपटा रहा है मरने के लिए छोड़ दिया तुमने जिसे अधूरा ताउम्र ऐसे ही सड़ने के लिए या फिर सिर्फ एक अदद ठन्डे गोश्त के लिए तुम खोल दो महमूदा, राधा, मैडम डीकोस्टा की काली सलवार सौ कैंडल पावर के बल्ब की कुलबुलाती रौशनी में... समाज उस जिस्मफरोश के आईने में… जिसकी जिस्म की तमन्ना थी उसे जिसकी खाल उधेर देना चाहता था वो ज...
मान लेने में और यक़ीन में फ़र्क़ है  दलदल में और ज़मीन में फ़र्क़ है  क़िताबें चाटते हैं क़िताबी कीड़े भी  पढ़े-लिखे और ज़हीन में फ़र्क़ है
जिन दो परायी आँखों में मेरा सपना पलता है मेरी उम्मीद के सांचे में, उसका अरमान ढलता है रूह बदन का नाता है, खुशबू गुल का रिश्ता है जिसे पाने की चाहत है, वो मुझे खोने से डरता है वो मेरा आईना है, मैं लिपटी उससे परछाई हूँ देखे अक्स ख़ुद का वो, मुझे पागल-पागल कहता है वो ग़ुम-शुदा है मुझमें और मैं ला-पता हूँ उसमें उसमें ख़ुद को पाता हूँ, वो ख़ुद से मुझमें मिलता है रुक - रुक कर कहता है, कहते - कहते रुकता है मुझसे कहने वाली बातें, ख़ुद से ही कहता रहता है जो घाटा है वो मुनाफ़ा है, मुनाफ़े में बस घाटा है इश्क़ में फ़क़ीर चौथी फेल, बस तारे गिनता रहता है