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मंटो तुम मर जाओ

मंटो
तुम्हें बुरी लत है
लिबास उतार देने की
पर नंगी जिस्मों पर
लिबास ही कब था 
तुम उधेर रहे हो खाल
परत दर परत
समाज की

फट रही हैं नसें
लहू जिस्म बनता जा रहा है
लहू ढँक लेगा बदन
लहू बन जाएगा कफन
लाश पड़ी है
'आज' की

मंटो
तुम मरे नहीं हो
लफ्ज़ दर लफ्ज़ मार रहे हो
क़ातिल हो तुम
उस क़ातिल से ज़्यादा
जिसके हाथ में खंज़र था
तुम ज़िंदा करते हो मुझे
हर कहानी में
अपनी ज़ुबानी में
अपने मुताबिक
बिछाकर चूहेदान
बना के शाहदोले का चूहा
लेकर फितरत
बाज की

मंटो
क्या ये कोई बात है
कि तुम हर शख्स को कर दो
टोबा टेक सिंह
या फिर
बारिश में भीगा
ज़ख़्मी
सर पे ज़ख्म उठाए
टिटवाल के कुत्ते सा
जिसकी जीभ पहुँच नहीं रही ज़ख्म तक
जिसके ज़ख्म से आ रही है बू
छटपटा रहा है
मरने के लिए
छोड़ दिया तुमने जिसे अधूरा
ताउम्र ऐसे ही सड़ने के लिए

या फिर
सिर्फ एक अदद ठन्डे गोश्त के लिए
तुम खोल दो
महमूदा, राधा, मैडम डीकोस्टा की
काली सलवार
सौ कैंडल पावर के बल्ब की
कुलबुलाती रौशनी में...
समाज उस जिस्मफरोश के आईने में…
जिसकी जिस्म की तमन्ना थी उसे
जिसकी खाल उधेर देना चाहता था वो
जिसकी बोटियों में पंजे धंसा देने की हसरत थी
समाज उस जिस्मफरोश के आईने में…
कभी माँ, कभी बहन, कभी बेटी देखे
रो न पाए
बस इक आह उछल के मुंह को आए

मंटो तुम्हारे इस हिमाकत पर
इस बेशर्म हक़ीक़त पर
क्यों न इलज़ाम लगाएं हम
क्यों न मुकदमा चलाएं हम
जेल की चक्की पिसवाएं हम
जो तुम हमें पागल किये देते हो
तो तुम्हें भी क्यों न
पागल, पागल, पागल
बताएं हम
तुम्हें क़ब्र से खुदवाएं हम
तुम्हें तुम्हारी रुदादों के साथ
उसूलों के साथ, बातों के साथ
फिर ज़िंदा दफनाएं हम

मंटो तुम मर जाओ!

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