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ग़ुमशुदा चाँद...

मेरा चाँद खो गया है मुझसे मिले, तो ज़रा मुझे बताना क़द? यही कोई दरम्याना सा मेरे हौसले से ज़रा-सा बुलंद रंग ऐसा कि सुबह भी सांवली लगे करे जो उसका सामना दिल में उतर जाए दूर तलक जैसे आईने के सामने रखा हो कोई आईना हँसे तो दो गालों पे झीलें उतर आएं उड़ते रंगों को भ्रम हो तितलियों सी इर्द-गिर्द मंडराएं दो गुलाबी पंखुड़ियों में बत्तीस हीरे जड़े ज़ुल्फ़ें जो झटक दे तो ग़रज़ के साथ छींटें पड़े आँखें चुम्बक सी खेंच ले जाती हैं इरादे चाहे जितने भी हों लोहा इशारे तिलिस्म लखनऊ के भूल-भुलइया से हर मोड़ पे है धोखा अंगड़ाइयां… इन्द्रधनुष का आठवां रंग आता है जिनको नींदें उड़ाना मेरा चाँद खो गया है मुझसे मिले तो ज़रा मुझे बताना

REVISED

माना कि फूलों की ज़ुबान क़तर जाएंगे खुशबू के शोर से बचकर किधर जाएंगे क्यों नहीं करते सामना वो आईने का उस अजनबी को देखेंगे तो डर जाएंगे वो परिंदा फिर न उड़ सकेगा *आईंदा जो पेट की सुनेगा तो उसके पर जाएंगे शेख की नसीहत 'सुकूं मिलेगा मस्जिद जा' करें जो मस्जिद का रुख तो तेरे घर जाएंगे उन पर इल्ज़ाम कैसे लगाओगे मियाँ नज़रों से कहके जुबां से *मुकर जाएंगे राम -ओ- रहीम तेरे एक घर के झगड़े में कितने बदनसीबों के घोंसले बिखर जाएंगे बुलंदी है शुरुआत गिरने की फ़क़ीर सर पर चढ़ेंगे तो नज़रों से उतर जाएंगे
जिस शजर की हवाओं से पाती हैं ज़िन्दगी ये पतंगें उन्हीं से लटक कर करेंगी कभी ख़ुदकुशी ये पतंगें तजर्बे का है हुनर उड़ना हवा के साथ मासूमियत  का  है  फ़न बरख़िलाफ़ उड़ती ये पतंगें छोटू के कॉपी के पन्नो को लग गया है पर इल्म को दे रही हैं नयी उरूज़ -ए- बुलंदी ये पतंगें आसमां की बंजर ज़मीन को बना दें ये आशियाँ आती रुतों  के  रंगीन गुलों  सी खिलती  ये पतंगें तजुर्बे के आसमान में उड़ रही हैं मिसाइलें मासूमियत  के  आसमान  में   हैं  उड़ती  ये पतंगें पर से कब हैं उड़ते, उड़ाते हैं हौसले सीखा  गयी  फ़क़ीर  बेपर  परवाज़  भरती ये पतंगें

भिखारी:

कुम्हलाई सी सुफ़ेद धूप का कफ़न ओढ़े मरा-मरा  ज़मीं पे पड़ा एक ठंडा जिस्म दिल की फांस, फंसी उम्मीद की आंच दिसम्बर की सुबह चराग़ सा बुझा-बुझा एक नंगा जिस्म ठंडी दुनिया से बचने के लिए ख़ुद को ऐसे सिकोड़ लेगा खुद में छुपी सूखी हुई धूप आख़िरी बूँद तक निचोड़ लेगा हर आने जाने वाला ताज्जुब से देख रहा है ‘एक मुर्दा कब्र के ऊपर धूप सेंक रहा है’ रुह बनके भूख जब आएगी इस मुर्दे को मौत से जगाएगी तब तलक इत्मीनान से इसे सोने दो...

ऐ धूल धमक पे आ जा तू

ऐ धूल.. ऐ धूल धमक पे आ जा तू अम्बर को भर ले मुट्ठी में सूरज की अकड़ को खा जा तू थूके तो बनके छींटें बनके छींटें गिरे जुगनू जुगनू ऐ धूल ऐ धूल धमक पे आ जा तू जिनके क़दमों ने तुझे रौंदा है धूल बन उनकी तू आँखों का  गर्द समझते हैं जो तुझको बन बवंडर उनकी राहों का  फूंक तू ऐसी चिंगारी  फूंक दे महल जले धूं धूं ऐ धूल ऐ धूल धमक पे आ जा तू दो से चार, चार से हज़ार हो एक-एक वार पैना, वार में धार हो पत्थर के हिटलर को तराशे जा मुजस्सम-ए-अवाम नक़्क़ाशे जा  बदल दे मौसम बढ़ा हरारत-ए-लहू ऐ धूल ऐ धूल धमक पे आ जा तू ऐ धूल ऐ धूल धमक पे आ जा तू

तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो एक दरख्त था जिसकी मीठी छांव ओढ़कर एक तन्हा तीखी दोपहर साथ साथ देखते रहे डाल-डाल चढ़ते हुए ख्वाबों को पाते बुलंदियां सर झुकाए आज भी याद करता है तुम्हें… तुम्हें याद हो कि न याद हो. -------------------------------------------------------------------------- वो जो एक झील थी जिसके ठहरे शीशे में कभी हम देखते थे आईना पानी के ऊपर थी बनी तस्वीर इक तिरी-मिरी रात थाली सी सजी परोसती थी जो पूनम का चाँद कल-कल जो जुबां में याद करती है तुम्हें… तुम्हें याद हो कि न याद हो. -------------------------------------------------------------------------- हवेली की वो बूढ़ी सी छत तन्हा सी अकेली सी छत छुपा लेती थी हमें हिफाज़त के आग़ोश में सीढ़ियां बताती थी जिसकी आ रहा है इधर कोई वो सीढ़ियां कब से खामोश हैं बस याद करके इक तुम्हें तुम्हें याद हो कि न याद हो -FAQEER
चाँद कितना बेचारा लगता है एक बुझा हुआ तारा लगता है आसमान के आईने में अजी अक्स हमारा लगता है बे-पतवार उतरा हूँ दरिया में देखो कहाँ किनारा लगता है कफ़न ओढ़े सोया है जो ज़िन्दगी का मारा लगता है उसकी रुख से धोखा खा गए आतिश भी प्यारा लगता है उसको वजूद कहता था अपना वो ख़ुद से हारा लगता है कितनों की मन्नतें हो गयी पूरी वो   टूटा ऐसा, तारा लगता है