Skip to main content

तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो एक दरख्त था
जिसकी मीठी छांव ओढ़कर
एक तन्हा तीखी दोपहर

साथ साथ देखते रहे
डाल-डाल चढ़ते हुए
ख्वाबों को पाते बुलंदियां

सर झुकाए आज भी
याद करता है तुम्हें…

तुम्हें याद हो कि न याद हो.
--------------------------------------------------------------------------

वो जो एक झील थी
जिसके ठहरे शीशे में कभी
हम देखते थे आईना

पानी के ऊपर थी बनी
तस्वीर इक तिरी-मिरी

रात थाली सी सजी
परोसती थी जो पूनम का चाँद

कल-कल जो जुबां में
याद करती है तुम्हें…

तुम्हें याद हो कि न याद हो.
--------------------------------------------------------------------------

हवेली की वो बूढ़ी सी छत
तन्हा सी अकेली सी छत

छुपा लेती थी हमें
हिफाज़त के आग़ोश में

सीढ़ियां बताती थी जिसकी
आ रहा है इधर कोई

वो सीढ़ियां कब से खामोश हैं
बस याद करके इक तुम्हें

तुम्हें याद हो कि न याद हो

-FAQEER




Comments

Popular posts from this blog

हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सुनो! मैं बादलों के बादलों से लब लड़ाऊंगा यही ज़िद है कि अब आब से मैं आग पाऊंगा मुझे तुम छोड़ के जो जा रहे हो तो चलो जाओ करूंगा याद ना तुमको, मगर मैं याद आऊंगा थमाया हाथ उसके एकदिन शफ्फाक आईना मिरा वादा था उससे चांद हाथों पर-सजाऊंगा ज़रा देखूं कि अब भी याद आता हूं उसे मैं क्या कि अपनी मौत की अफवाह यारों मैं उड़ाऊंगा लड़ाऊं आंख से मैं आंख, वादा था मिरा उसको अजी पानी नहीं जानां, मैं मय में मय मिलाऊंगा बदन शीशे का तेरा और संगदिल भी तुही जानां तुझे तुझसे बचाऊं तो भला कैसे बचाऊंगा
मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.