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तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो एक दरख्त था
जिसकी मीठी छांव ओढ़कर
एक तन्हा तीखी दोपहर

साथ साथ देखते रहे
डाल-डाल चढ़ते हुए
ख्वाबों को पाते बुलंदियां

सर झुकाए आज भी
याद करता है तुम्हें…

तुम्हें याद हो कि न याद हो.
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वो जो एक झील थी
जिसके ठहरे शीशे में कभी
हम देखते थे आईना

पानी के ऊपर थी बनी
तस्वीर इक तिरी-मिरी

रात थाली सी सजी
परोसती थी जो पूनम का चाँद

कल-कल जो जुबां में
याद करती है तुम्हें…

तुम्हें याद हो कि न याद हो.
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हवेली की वो बूढ़ी सी छत
तन्हा सी अकेली सी छत

छुपा लेती थी हमें
हिफाज़त के आग़ोश में

सीढ़ियां बताती थी जिसकी
आ रहा है इधर कोई

वो सीढ़ियां कब से खामोश हैं
बस याद करके इक तुम्हें

तुम्हें याद हो कि न याद हो

-FAQEER




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हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
मिरा होगा फ़क़त तू सुन, हमारा तो नहीं होगा तुझे गर तू भी चाहे तो गंवारा तो नहीं होगा जिसे तुम दोस्त कहते हो, उसे तुम आज़माओ तो जहाँ डूबे वहाँ होगा, पुकारा तो नहीं होगा मुहब्बत का दुबारा, तजरबा, कुछ यूं हुआ यारों ग़लत थे हम हमें धोखा दुबारा तो नहीं होगा मिटाया है अभी उसने फ़क़त सिन्दूर माथे का अभी कंगन वो सोने का उतारा तो नहीं होगा अजी उसको तो मेरी बंद आँखें देख लेती हैं नज़र वालों, नज़र होगी, नज़ारा तो नहीं होगा