Skip to main content


जिस शजर की हवाओं से पाती हैं ज़िन्दगी ये पतंगें
उन्हीं से लटक कर करेंगी कभी ख़ुदकुशी ये पतंगें


तजर्बे का है हुनर उड़ना हवा के साथ
मासूमियत  का  है  फ़न बरख़िलाफ़ उड़ती ये पतंगें

छोटू के कॉपी के पन्नो को लग गया है पर
इल्म को दे रही हैं नयी उरूज़ -ए- बुलंदी ये पतंगें

आसमां की बंजर ज़मीन को बना दें ये आशियाँ
आती रुतों  के  रंगीन गुलों  सी खिलती  ये पतंगें

तजुर्बे के आसमान में उड़ रही हैं मिसाइलें
मासूमियत  के  आसमान  में   हैं  उड़ती  ये पतंगें

पर से कब हैं उड़ते, उड़ाते हैं हौसले
सीखा  गयी  फ़क़ीर  बेपर  परवाज़  भरती ये पतंगें

Comments

Popular posts from this blog

हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
वो बूढा घर के बाहर जिसे सुलाया गया उसी बूढ़े के पेंशन से किराया गया कि दहशतगर्द क्यों मुस्लिम ही होते हैं डरे मन को डरे जन से डराया गया उसे बरअक़्स, मेरे ही, किया सबने मुझी को मुझसे फिर यूं  आज़माया गया बड़ा है मतलबी जग, माँ जिसे बोला कि दसवें दिन उसी माँ को बहाया गया नहीं धुलता था पानी से किसी सूरत  लहू से उस लहू को फिर मिटाया गया छुआ कुम्हार  ने,  था जात का छोटा उसी के बने घड़े से  फिर  नहाया गया