Skip to main content

Posts

तक़दीर:

एक नजूमें (Fortuneteller) ने कहा था 'इन्हीं हाथों के मकड़जालों में ही तेरी दुनिया तमाम है... ....यही तेरे सफ़र की इब्तिदा (Beginning) है रस्ता है मक़ाम है.' मैंने ये महसूस किया है जबसे वो मिलने लगी है हथेलियों पर इक नयी लक़ीर उभरने लगी है.

सोन चिडैया

(ग़ायब होती गोरैया के नाम....) मेरी सोन चिडैया किधर गयी? मेरी सोन चिडैया किधर गयी? पंख - पंख जो बिखर गयी मेरी सोन चिडैया कहाँ गयी? जगी सुबह आती थी जो जीवन गीत गाती थी जो शाख़ पे बैठी गुलाब थी जो ख़ुली आँखों का ख़्वाब थी जो जाने कब हमसे बिछड़ गयी? मेरी सोन चिडैया कहाँ गयी? सुबह -ओ- शाम जहाँ गुंजन था पेड़ नहीं वो उपवन था बसंत जहाँ हर मौसम था तरक्क़ी में लेकिन अड़चन था घर की छत उठानी थी मासूमों पे विपदा आनी थी खड़े दीवार - ओ- दर हुए कई मासूम बेघर हुए..... घोंसला उसका छूट रहा था तिनका - 2 दिल टूट रहा था देख बेचारी सिहर गयी.... मेरी सोन चिडैया कहाँ गयी? वो मेरे घर भी आती थी दाना - पानी पाती थी वो मेरे घर भी आती थी दाने -दो- दाने ही चखना जितना चाहिए उतना ही रखना सीख हमें दे जाती थी वो मेरे घर भी आती थी.... दिनों बाद उसका पर मिला है उसकी अश्क़ों से तर मिला है हूक उठी दिल में और शर्म से झुका सर मिला है... दिनों बाद उसका पर मिला है पूछने लगे बच्चे मेरे पंख पे उनकी जो नज़र गयी मेरी सोन चिडैया कहाँ गयी?

गुज़रा वक़्त ---------

तस्वीरों से फुरसत पाकर यादों में मसरूफ़ हो गया.... हर बार की तरह दिल ने चाहा फिर लौट चलें दोनों सिरे से बंद उस गली में जिसे कहते हैं माज़ी मैं तो तैयार ही था बस वक़्त ही न हुआ राज़ी... यादों से पाकर फुरसत टेबल कैलेण्डर में मसरूफ़ हो गया... उंगलियाँ परत-दर-परत उसके बीते छिलके उतारने लगीं. किसी वक़्त को खुद में जकड़े कोई लाल स्याही आवाज़ देकर रोक लेती थी. फिर कोई यादों का पुलिंदा खोल देती थी. घडी भर उनकी सोहबत में रहकर फिर सोचता था. वक़्त लौटता क्यूँ नहीं..... वो मासूम माँ की उंगली छोड़ने की गुस्ताख़ी कर गया क्या? मेले की रौशनी में चिराग़ कोई बिछड़ गया क्या? या किसी की मुश्त के कफस में हो.... छूटना शायद उसके न बस में हो.... फिर किसी ने बताया मुझको गुज़ारा वक़्त लौटकर नहीं आता कभी.... तो क्या वक़्त गुज़र गया? अपना वक़्त करके पूरा वक़्त भी मर गया? शायद हाँ....तभी तो उसकी रूह भटकती है. सताती है हमको खुद भी तडपती है.... तभी तो बीते वक़्त की धड़कने भी थम गयीं हैं. टिक - टिक की आवाजें खामोशियाँ ओढे जम गयीं हैं. गर ऐसा है तो.... चलो उसकी रूह की ख़ातिर अमन मांग ले.... और कैलेण्डर के बीते पन्नो पर एक...

अक्स:

तुम्हारी मौजूदगी की एक परत दबी है मेरे वजूद की तहों में. जब भी ख़ुद पर से ख़ुद का मलबा कुरेदने लगता हूँ..... चंद तहों के बाद तुम ख़ुद को मुझपर बिछा देती हो... सजा देती हो..... मुझको मुझसे ही मिटा देती हो.... चाह कर भी तुम्हारे वजूद से आज़ाद नहीं हो पाया... या यूं कहूं कि मैं ख़ुद से आज़ाद नहीं हो पाया ..... हर पल, हर कहीं साथ तुम हो... दीवार हूँ मैं ख़ुद के लिए बुनियाद तुम हो.....

सोचता हूँ कि..................

आज सूरज का गुस्सा अचानक मद्धम हो गया. जेठ खुद -ब- खुद सावन हो गया. ... तुम्हारी खुली जुल्फें देखी तो समझा जाना यूं बेमौसम बादलों का मेहमां बनके आना सोचता हूँ कि यूंही तुम खुली रखो जुल्फें तो क्या हो? बारिश की मेहरबानी फिर तो हर जगह हो.... दरिया फिर रेत की नागिन हो जाये और रेगिस्तान बेवा से सुहागिन हो जाये. फिर तो विरानियाँ बेज़ार हो जाएँगी.... मजदूरों - सा शहर का रुख़ करने को तैयार हो जाएँगी.... ------------------------------ ------------------------------ ------------------------------ - लफ्ज़ शबनम से तेरे लबों की पंखुड़ियों पे लटकते हैं.... शर्मीले हैं तुम - से लब छोड़ते हुए लरज़ते हैं... सोचता हूँ कि गर तुम्हारे लब बोलने को तैयार हो जाएँ..... फिर तो कानो में घुलने लगे शहद शहद की मक्खियाँ यूंही बेरोजगार हो जाएँ.... सोचता हूँ कि गर तुम सीख जाओ गुलाबी पलकें उठाना.... सारा शहर यूंही हो जाये मवाली फिर तो बर्बाद हो जाये सारा मयखाना ....... इसलिए... सोचता हूँ कि लाजिम है तेरी ख़ामोशी लाजिम है तेरा शर्माना..... सोचता हू...

एक खोया क़स्बा.....

दूर... बहुत दूर है घर मेरा इतनी दूर कि ख़्वाबों के ज़रिये भी वहां पहुँचने में दिनों लग जाते हैं..... दरअसल ख़्वाब ही मेहमान सरीखे कभी कभार ही आते हैं...... नींद की मेहरबानी है. या यूं कहिये कि मनमानी हैं. ख़ैर, घर से चार छलांग लगाते ही एक पुराना सा मंदिर है. अभी दूरी बढ़ गयी हो तो पता नहीं. बचपन में लेकिन इससे ज्यादा वक़्त कभी लगा नहीं. मंदिर के अन्दर कई बूत हैं. बूतों में लोग ख़ुदा ढूंढतें हैं. और ख़ुदा..... दिन - दिन भर मंदिर के अन्दर - बाहर खेलते कूदतें हैं. प्रसाद लूटतें हैं. पास ही एक तालाब है. जिसके ठहरे शीशे में आसमान अपना चेहरा सजाता है. कभी सिर पर सूरज, कभी चाँद लगाता है. रातों को हमने कई दफ़ा मिटटी के ढेलों से चाँद तोडा है..... रेजा - रेजा करके छोड़ा है. टूटकर वो लहरों के साथ दूर दूर तक बिखर जाता था. बड़ा ढीठ था मौका मिलते ही पानी के ठहरते ही फिर जुड़कर...... खाने को दोमट मिटटी के पत्थर चला आता था. हमारी तरह शायद उसको भी सौंधी खुशबू मिटटी की बहुत भाती थी...

पानी

--> इस पानी में ये बू सी क्यूँ है? बेरंग सी हुआ करती थी अब ये लहू सी क्यूँ है? क्यूँ लगती है ये कभी नमकीन मुझे किसी के हैं ये अश्क़ ..... क्यूँ इस दहशत पे है यक़ीन मुझे ? शिव की जटाओं में ये विदेशी रिबन किसका है? प्यास भरी हैं बोतलों में लुटा ज़मीर -ओ- ज़ेहन किसका है? छीनकर हमसे सुराही कटोरा हमें थमाया है किसने? दरिया को ताल आख़िर बनाया है किसने? हर घूँट में ज़हर -ए- तरक्क़ी मिलाया है किसने? जिसके लहू से धोये है तूने हर पाप .... हर दाग़ ऐ खूं - हराम दुनिया कर कुछ तो याद आँखों से बनके अश्क़ रिसती वही है जुनूं - सी खूं - सी नसों में दौड़ती वही है. जिस माँ की दूध ने सींची है तरक्क़ी वो बिजली, ये पटरी वो उड़न तश्तरी ये आटा चक्की क्या सिला दिया है उसके ममता का ऐ इंसां घोल दिया ज़हर उसमें मौत कर दी उसकी पक्की दी है उसे तुमने बस आठ साल की मोहलत जूडस चाँदी के तीस सिक्के!!!! तुम्हें पचेगी नहीं ये दौलत जूडस चाँदी के तीस सिक्के!!!! तुम्हें पचेगी नहीं ये दौलत............