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हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
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सुनो! मैं बादलों के बादलों से लब लड़ाऊंगा यही ज़िद है कि अब आब से मैं आग पाऊंगा मुझे तुम छोड़ के जो जा रहे हो तो चलो जाओ करूंगा याद ना तुमको, मगर मैं याद आऊंगा थमाया हाथ उसके एकदिन शफ्फाक आईना मिरा वादा था उससे चांद हाथों पर-सजाऊंगा ज़रा देखूं कि अब भी याद आता हूं उसे मैं क्या कि अपनी मौत की अफवाह यारों मैं उड़ाऊंगा लड़ाऊं आंख से मैं आंख, वादा था मिरा उसको अजी पानी नहीं जानां, मैं मय में मय मिलाऊंगा बदन शीशे का तेरा और संगदिल भी तुही जानां तुझे तुझसे बचाऊं तो भला कैसे बचाऊंगा
सागर से उसको इश्क़ साहिल से नहीं मछली डरे हासिल से मुश्किल से नहीं उसके नगर का तौर है हमसे जुदा घर घर जुड़े हैं हाय दिल-दिल से नहीं सूरज निकलते ही बुझा डाला दिया है बस चमक से इश्क़ काबिल से नहीं वो इश्क़ तो करता है पर शादी नहीं मैं शौक़ से डरता हूँ क़ातिल से नहीं हो बेबसी तो माफ़ है हर इक ख़ता झूठों से डरता हूँ मैं बातिल से नहीं
वो बूढा घर के बाहर जिसे सुलाया गया उसी बूढ़े के पेंशन से किराया गया कि दहशतगर्द क्यों मुस्लिम ही होते हैं डरे मन को डरे जन से डराया गया उसे बरअक़्स, मेरे ही, किया सबने मुझी को मुझसे फिर यूं  आज़माया गया बड़ा है मतलबी जग, माँ जिसे बोला कि दसवें दिन उसी माँ को बहाया गया नहीं धुलता था पानी से किसी सूरत  लहू से उस लहू को फिर मिटाया गया छुआ कुम्हार  ने,  था जात का छोटा उसी के बने घड़े से  फिर  नहाया गया 
वही इक जो किसी की अब अमानत है मुहब्बत की वही मेरी ज़मानत है कभी थप्पड़ कभी छप्पर कभी साया पिता का हाथ सरपर हिफाज़त है भला हो आप बोले, आप बोले तो शिकायत भी अजी मुझपर इनायत है हमें अब आप रुख़सत दें, कहा हमने गले में बाँह डाला, कहा इजाज़त है उसे चाहो उसे लेकिन बताओ मत मुहब्बत में शराफत हो तो लानत है सभी को नाम से उसके बुलाता हूँ बुरा है ये, बुरी वो एक आदत है जिसे तुम कह रहे हो इक कहानी बस कहानी वो हमारी तो हक़ीक़त है मिले कैसे अगर मिलना भी चाहें हम चमन गंजा हुनर उसका हजामत है
लो शज़र को मैं जगाने लगा हूँ हवा को अब तूफ़ाँ बनाने लगा हूँ बूँद गुंजाइश रखे है नदी की ओस हूँ बादल बनाने लगा हूँ फिर हिला मुर्दा बदन जो सुना ये देख माँ मैं अब कमाने लगा हूँ दाग़ पानी से गया ही नहीं जब ख़ूँ से अब मैं ख़ूँ मिटाने लगा हूँ ज़ख्म मेरा देख न ले ज़माना आँख मैं भी अब दिखाने लगा हूँ हाय मैंने ही था दाना खिलाया जाल भी मैं ही बिछाने लगा हूँ
मिरा होगा फ़क़त तू सुन, हमारा तो नहीं होगा तुझे गर तू भी चाहे तो गंवारा तो नहीं होगा जिसे तुम दोस्त कहते हो, उसे तुम आज़माओ तो जहाँ डूबे वहाँ होगा, पुकारा तो नहीं होगा मुहब्बत का दुबारा, तजरबा, कुछ यूं हुआ यारों ग़लत थे हम हमें धोखा दुबारा तो नहीं होगा मिटाया है अभी उसने फ़क़त सिन्दूर माथे का अभी कंगन वो सोने का उतारा तो नहीं होगा अजी उसको तो मेरी बंद आँखें देख लेती हैं नज़र वालों, नज़र होगी, नज़ारा तो नहीं होगा