Skip to main content

समंदर को कितना गुरूर है अपनी रवानी पर
कोई तस्वीर देर तक टिकती नहीं है पानी पर

प्यादा बन सकता है बादशाह एक सब्र के बाद
कहीं किरदार ही भारी न पड़ जाए कहानी पर

लाली पाउडर होते हैं जैसे दाग धब्बों पे
दौलत का भी बस वही है असर बेईमानी पर

काटकर हाथ उसने सोचा ज़ुबान मेरी काट ली
कागज़ बोलते हैं मेरी ही कलम की ज़ुबानी पर

सोचता था उसके बग़ैर दुनिया अंधेरी रह जाएगी
चाँद को देख पशेमां सूरज, जा गिरा पानी पर

फ़क़ीर बिगड़ गया है, बारहा बोलती है ये दुनिया
भलो की भला दुनिया, हुई है कब दीवानी पर


Comments

Popular posts from this blog

मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सागर से उसको इश्क़ साहिल से नहीं मछली डरे हासिल से मुश्किल से नहीं उसके नगर का तौर है हमसे जुदा घर घर जुड़े हैं हाय दिल-दिल से नहीं सूरज निकलते ही बुझा डाला दिया है बस चमक से इश्क़ काबिल से नहीं वो इश्क़ तो करता है पर शादी नहीं मैं शौक़ से डरता हूँ क़ातिल से नहीं हो बेबसी तो माफ़ है हर इक ख़ता झूठों से डरता हूँ मैं बातिल से नहीं