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कि मैं तेरे रहम ओ करम का *मुंतज़िर नहीं हूँ
तेरी महफ़िल में मौजूद हूँ, हाज़िर नहीं हूँ
मेरे लब पे न आएगा मेरे क़ातिल तेरा नाम
ज़मीर अभी भी ज़िंदा है, अव्वल *मुखबिर नहीं हूँ
मैं तुझे पाने के लिए, क्या ख़ुद को बेच दूं?
तेरे लिए तो हूँ, सिर्फ तिरी ही ख़ातिर नहीं हूँ
तेरे दिल के बाद कितने दिलों ने दी दस्तक मुझे
तू देख आज भी बेघर हूँ, *मुहाज़िर नहीं हूँ
मेरा ग़ुस्सा मेरे ग़म की फक़त पर्दादारी है
तिरी बेवफ़ाई में शामिल हूँ, ज़ाहिर नहीं हूँ
अमृता वो बेदिल है, जो दिल का मरीज़ बना दे
क्या फ़रक़ कि फ़क़ीर हूँ मैं, कोई साहिर नहीं हूँ


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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सागर से उसको इश्क़ साहिल से नहीं मछली डरे हासिल से मुश्किल से नहीं उसके नगर का तौर है हमसे जुदा घर घर जुड़े हैं हाय दिल-दिल से नहीं सूरज निकलते ही बुझा डाला दिया है बस चमक से इश्क़ काबिल से नहीं वो इश्क़ तो करता है पर शादी नहीं मैं शौक़ से डरता हूँ क़ातिल से नहीं हो बेबसी तो माफ़ है हर इक ख़ता झूठों से डरता हूँ मैं बातिल से नहीं