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जो था कभी पोशीदा वो पोशीदा फिर नहीं रहा
जो था ज़ाहिर वो फिर कभी ज़ाहिर नहीं रहा


ये मंज़िलें ही हैं सफर की सबसे बड़ी अड़चन
मिली जो मंज़िल तो मुसाफिर मुसाफिर नहीं रहा

उसे ख़ुदा की अज़मत पर यक़ीन नहीं था कभी
तुझसे मिला है जब से वो, तो काफ़िर नहीं रहा

इश्क़ है, इश्क़ पाने में खुद को खो देना
जनाज़े में उठी अमृता, खबर उडी साहिर नहीं रहा

अब तो जब जी चाहे छू लूं उसे, आँखें मूंदकर
छुपने-छुपाने के खेल में अब वो माहिर नहीं रहा

तेरी बात मान लेता तो बात खत्म ही हो जाती
ग़ुफ़्तगू की चाहत में तुझसे कभी मुत्तासिर नहीं रहा

पैरों में वक़्त बांध के, मौत से ज़रा पहले
फिर कहना, फ़क़ीर अब मेरा मुन्तज़िर नहीं रहा

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.

मदारी

अरे! हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरा पिटारा, है जग सारा, दुनियादारी हो तेरे इशारे का सम्मान करें ख़ुद हनुमान तुम मांगो भीख तेरे कब्ज़े में भगवान ईश का करतब इंसान और ईश इंसानी कलाकारी हो   हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! आस्तीन सा एक पिटारा सांप हम जै सा तुम्हारा सर पटके बार बार विष उगलने को तैयार न ज़हर उगल आज मत बन रे समाज काटने- कटने की ये बीमारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरे जमूरे- आधे अधूरे भूखे - नंगे , हर हर गंगे हाथसफाई के उस्ताद पर लगे कुछ न हाथ जीने के लिए जान लगाएं ज़ख्म से ज़्यादा कुछ न पाएं हवा खाएं साएं – साएं बचपन के सर चढ़ गयी ज़िम्मेदारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो!
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