Skip to main content
जो था कभी पोशीदा वो पोशीदा फिर नहीं रहा
जो था ज़ाहिर वो फिर कभी ज़ाहिर नहीं रहा


ये मंज़िलें ही हैं सफर की सबसे बड़ी अड़चन
मिली जो मंज़िल तो मुसाफिर मुसाफिर नहीं रहा

उसे ख़ुदा की अज़मत पर यक़ीन नहीं था कभी
तुझसे मिला है जब से वो, तो काफ़िर नहीं रहा

इश्क़ है, इश्क़ पाने में खुद को खो देना
जनाज़े में उठी अमृता, खबर उडी साहिर नहीं रहा

अब तो जब जी चाहे छू लूं उसे, आँखें मूंदकर
छुपने-छुपाने के खेल में अब वो माहिर नहीं रहा

तेरी बात मान लेता तो बात खत्म ही हो जाती
ग़ुफ़्तगू की चाहत में तुझसे कभी मुत्तासिर नहीं रहा

आ पैरों में वक़्त बांध के, मौत से ज़रा पहले
फिर न कहना, फ़क़ीर अब मेरा मुन्तज़िर नहीं रहा

Comments

Popular posts from this blog

मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
बदन प र  सीलन पड़ी, रूह नम पड़ गयी  हमारी हिफाज़त को छत,  कम पड़ गयी