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सूत पुत्र कर्ण



1. हे गिरधारी ! हे निस्वार्थ!
भले ही परमार्थ
तुम्हारी मंशा में निहित है
... विराट ईश्वरीय स्वार्थ

क्या अधर्म नहीं है ये,
तथाकथित धर्म का...
क्या है कोई विकल्प
... इस सूत पुत्र कर्ण का....

2. दुर्भाग्य ने हो डंसा जिसे
जननी ने हो तजा जिसे
आगत पीढियां पूछेंगी
क्यूँ भगवान् ने भी छला उसे

क्या प्रत्युत्तर होगा तुम्हारा
प्रश्न के इस मर्म का
क्या है कोई विकल्प
इस सूत पुत्र कर्ण का.....

3. स्वयंवर का दिन स्मरण करो
अन्याय वो मनन करो
मेरी चढ़ी प्रत्यंचा रोक ली
कहकर मुझे सारथी

क्या करूं बताओ मुझे
अपमान के इस दहन का...
क्या है कोई विकल्प
इस सूत पुत्र कर्ण का....

4. जब सबने मुझे ठुकराया था
गांधेरेय ने मुझे अपनाया था
सहलाकर घाव मेरे
मुझे गले से लगाया था

क्या मोल न चुकाऊं मैं
मित्रता के चलन का....
क्या है कोई विकल्प
इस सूत पुत्र कर्ण का....

5. पांडव जीते दुर्भाग्य
हारकर जुए में
कौरव नेत्रहीन हुए
स्वार्थ के धुंए में

कोई कारण बताओ मुझे
अकारण मेरे पतन का
क्या है कोई विकल्प
इस सूत पुत्र कर्ण का....

6. इस नश्वर जीवन का
तनिक मुझे लोभ नहीं
इन्द्र की याचना पर
रंज मात्र क्षोभ नहीं

हे प्राणघाती जीवनदाता!
मुझे भय नहीं है मरण का
क्या है कोई विकल्प
इस सूत पुत्र कर्ण का....

7. लेकिन पूछेगी मेरी खुली आँखें
और मेरा ये पार्थिव शरीर
भक्त धंसेगा तुम्हे ही
बनके प्रश्न, बनके तीर

बलिदान, भक्ति, मित्रता, वीरता में
जाति का क्या वर्ण का ?
क्या है कोई विकल्प
इस सूत पुत्र कर्ण का....

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
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