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एक बीज लगा रहा हूँ, मैं एक शजर के लिये
है ये इंतजाम बहुत, आख़िरी सफ़र के लिये
दीवारें दीवारों से जुड़ी हैं, घर घर से नहीं जुड़े
इस तरह अजनबी है शहर, शहर भर के लिये
देखा न करो यूं आईना, मेरी जां मेरी नज़र से
अपनी ही नज़र है बहुत, बुरी नज़र के लिये
दिल लगा रहा हूँ, कि भूलना है दिल का टूटना
है बहुत ही लाज़िमी ये ज़हर, ज़हर के लिये
है उसे भी एक आस, पानी को भी लगती है प्यास
तट पे नदी आयी, जाने किस लहर के लिये
हक़ीम की दवा है, या हक़ीम ही दवा है
फ़क़ीर दुआ ना करो, दवा में असर के लिये

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी

फेसबुक : चेहरों की किताब

ख़ुद एक चेहरे पर चढाये हज़ार चेहरे. अजनबी तहें खंगालने को बेकरार चेहरे. नंगे होने से जो कतराते हैं, हर वक़्त मुखौटों के तलबगार चेहरे. तेरे मेरे उसके शुमार - बेशुमार चेहरे, साथ हैं कुछ, कुछ दरकिनार चेहरे. काले गोरे सस्ते मंहगे हासिल मुश्किल चेहरों के है ‘खुले बाज़ार’ चेहरे. और हो गया तन्हा इनसे मिलके, तन्हाई की गिरफ़्त में हैं गिरफ़्तार चेहरे. जाने - पहचाने अजनबी से हैं कुछ, मकान -ए- दिल तोड़कर हुए बेज़ार चेहरे. सवालों से कभी नंगी तलवार चेहरे, और कभी जवाबों से मझधार चेहरे. जाने फिर क्यूँ ये खुशफहमी है, छिपे हैं इनमें ही पतवार चेहरे. चलो इसके बहाने वो क़रीब तो आये, बाबदन फासलों से दो लाचार चेहरे. इन्हीं किताबी चेहरों की है इक किताब, तिलस्मी चेहरे दर्ज हैं जिसमें बेहिसाब. उम्मीद की जो इक लौ जलाता है, लापता चेहरों का पता ढूंढ कर लाता है......