Skip to main content
उसने बेरुखी से कहा जब
‘तुम्हें जीना है अकेले’
एक वही तो भीड़ था, अब
छूटे जहाँ के मेले
उसके बिना है जीना
दुश्मन की बद्-दुआ है
उसके बिना है जीना
मुझे मौत की सज़ा है
उसके बिना है जीना
कि किस्तों में जान जाए
उसके बिना है जीना
मछली डूब मरी हाय
उसके बिना है जीना
है आतिश का इक समंदर
उसके बिना है जीना
बंधे-हाथ तैरना अन्दर
उसके बिना है जीना
पाँव में ज्यूं आबले हैं
उसके बिना है जीना
और मीलों के फासले हैं
उसके बिना है जीना
कि बदन कफ़न है ये
उसके बिना है जीना
ख़ुद में ही दफ़न है ये
उसने बेरुखी से कहा जब
‘इक खेल था जो हम खेले’
एक वही तो भीड़ था, अब
छूटे जहाँ के मेले

Comments

Popular posts from this blog

हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सुनो! मैं बादलों के बादलों से लब लड़ाऊंगा यही ज़िद है कि अब आब से मैं आग पाऊंगा मुझे तुम छोड़ के जो जा रहे हो तो चलो जाओ करूंगा याद ना तुमको, मगर मैं याद आऊंगा थमाया हाथ उसके एकदिन शफ्फाक आईना मिरा वादा था उससे चांद हाथों पर-सजाऊंगा ज़रा देखूं कि अब भी याद आता हूं उसे मैं क्या कि अपनी मौत की अफवाह यारों मैं उड़ाऊंगा लड़ाऊं आंख से मैं आंख, वादा था मिरा उसको अजी पानी नहीं जानां, मैं मय में मय मिलाऊंगा बदन शीशे का तेरा और संगदिल भी तुही जानां तुझे तुझसे बचाऊं तो भला कैसे बचाऊंगा
मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.