Skip to main content
कर रहे हैं हरपल ख़ुदकुशी देखिये 
कहते हैं किसको ज़िन्दगी देखिये 

आँखों पर छाने लगेगा अँधेरा 
पल भर जो रौशनी देखिये 

डंक मरती हैं चीटियाँ जुबां से
अलफ़ाज़ है कितनी चाशनी देखिये

रोज़ा से कब होती हैं मुरादें पूरी
मुफ़लिस की फाकाकशी देखिये

अपनी गिरेबां झाँकने से अच्छा
फ़क़ीर ख़ुदा में कोई कमी देखिये 


इसी मिज़ाज लेकिन अलग खानदान के चंद शेर:

कहने को जुदा हैं मुझ से
दिखती हैं चाहे कहीं देखिये


अपनी तकदीर जानने के लिए
अपनी नहीं उनकी ज़बीं देखिये


दूर से हर चीज़ लगती है हसीं
कभी चाँद से आप ज़मीं देखिये

Comments

Popular posts from this blog

मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी

फेसबुक : चेहरों की किताब

ख़ुद एक चेहरे पर चढाये हज़ार चेहरे. अजनबी तहें खंगालने को बेकरार चेहरे. नंगे होने से जो कतराते हैं, हर वक़्त मुखौटों के तलबगार चेहरे. तेरे मेरे उसके शुमार - बेशुमार चेहरे, साथ हैं कुछ, कुछ दरकिनार चेहरे. काले गोरे सस्ते मंहगे हासिल मुश्किल चेहरों के है ‘खुले बाज़ार’ चेहरे. और हो गया तन्हा इनसे मिलके, तन्हाई की गिरफ़्त में हैं गिरफ़्तार चेहरे. जाने - पहचाने अजनबी से हैं कुछ, मकान -ए- दिल तोड़कर हुए बेज़ार चेहरे. सवालों से कभी नंगी तलवार चेहरे, और कभी जवाबों से मझधार चेहरे. जाने फिर क्यूँ ये खुशफहमी है, छिपे हैं इनमें ही पतवार चेहरे. चलो इसके बहाने वो क़रीब तो आये, बाबदन फासलों से दो लाचार चेहरे. इन्हीं किताबी चेहरों की है इक किताब, तिलस्मी चेहरे दर्ज हैं जिसमें बेहिसाब. उम्मीद की जो इक लौ जलाता है, लापता चेहरों का पता ढूंढ कर लाता है......