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कर रहे हैं हरपल ख़ुदकुशी देखिये 
कहते हैं किसको ज़िन्दगी देखिये 

आँखों पर छाने लगेगा अँधेरा 
पल भर जो रौशनी देखिये 

डंक मरती हैं चीटियाँ जुबां से
अलफ़ाज़ है कितनी चाशनी देखिये

रोज़ा से कब होती हैं मुरादें पूरी
मुफ़लिस की फाकाकशी देखिये

अपनी गिरेबां झाँकने से अच्छा
फ़क़ीर ख़ुदा में कोई कमी देखिये 


इसी मिज़ाज लेकिन अलग खानदान के चंद शेर:

कहने को जुदा हैं मुझ से
दिखती हैं चाहे कहीं देखिये


अपनी तकदीर जानने के लिए
अपनी नहीं उनकी ज़बीं देखिये


दूर से हर चीज़ लगती है हसीं
कभी चाँद से आप ज़मीं देखिये

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.

मदारी

अरे! हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरा पिटारा, है जग सारा, दुनियादारी हो तेरे इशारे का सम्मान करें ख़ुद हनुमान तुम मांगो भीख तेरे कब्ज़े में भगवान ईश का करतब इंसान और ईश इंसानी कलाकारी हो   हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! आस्तीन सा एक पिटारा सांप हम जै सा तुम्हारा सर पटके बार बार विष उगलने को तैयार न ज़हर उगल आज मत बन रे समाज काटने- कटने की ये बीमारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो! तेरे जमूरे- आधे अधूरे भूखे - नंगे , हर हर गंगे हाथसफाई के उस्ताद पर लगे कुछ न हाथ जीने के लिए जान लगाएं ज़ख्म से ज़्यादा कुछ न पाएं हवा खाएं साएं – साएं बचपन के सर चढ़ गयी ज़िम्मेदारी हो हे मदारी! रे मदारी! रे मदारी! हो!
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