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ये जो बे-ईमानी की बीमारी है
खुद से की गयी ईमानदारी है

वफ़ादार रहूँ मैं तेरे साथ
मेरे साथ तेरी भी ज़िम्मेदारी है


तुमने पहनी है जो वफ़ा की कमीज़
खैराती है ये, मैंने ही उतारी है

जो तुम नहीं समझते हो मेरी बात
ये नासमझी ग़ज़ब होशियारी है

चिंगारी भड़काए, चराग़ बुझा दे
हवाओं में भी अब तरफदारी है

महंगे लिबाज़ में नंगे हो साहब
कहते थे ग़रीबी नहीं, ख़ुद्दारी है


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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
वो बूढा घर के बाहर जिसे सुलाया गया उसी बूढ़े के पेंशन से किराया गया कि दहशतगर्द क्यों मुस्लिम ही होते हैं डरे मन को डरे जन से डराया गया उसे बरअक़्स, मेरे ही, किया सबने मुझी को मुझसे फिर यूं  आज़माया गया बड़ा है मतलबी जग, माँ जिसे बोला कि दसवें दिन उसी माँ को बहाया गया नहीं धुलता था पानी से किसी सूरत  लहू से उस लहू को फिर मिटाया गया छुआ कुम्हार  ने,  था जात का छोटा उसी के बने घड़े से  फिर  नहाया गया