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किसी बिके हुए अखबार सी लगती है
ये दुनिया मुझे इश्तिहार सी लगती है

कर रहा हूँ मैं उसी से दवा की उम्मीद
जो ख़ुद ही कुछ बीमार सी लगती है

मसरूफियत में भूल जाता हूँ तुझे
बस तन्हाई में इक दरकार सी लगती है

वो तेरी वादाफ़रामोशी, वो तेरा हूनर
सर सी कभी तू सरकार सी लगती है

अपनी हथेली से ढंक लेना तेरा रूख़
तेरी ज़ुल्फ़ें तेरी पहरेदार सी लगती है

मौसम ने बदलने का हूनर तुझसे है सीखा
एक कभी तो कभी हज़ार सी लगती है

तुझे याद करेगी तेरे लफ़्ज़ों से ये दुनिया
'फ़क़ीर' तेरी ग़ज़लें तेरी मज़ार सी लगती 

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फेसबुक : चेहरों की किताब

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