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सुबह सुबह

सूरज जगा,
सुबह जगी...
उड़ते सरगम के कलरव से
नींद टूटी...

मैंने कहा
उठ जा रिमझिम
मंत्र सरीखा
"खुल जा सिमसिम"..

पलकों के दो परदे खुले
दो गहरी झीलें जगी

दो लचकदार नाज़ुक टहनियां,
बिखरे सावन
बटोरने लगी .

दो पंखुड़ियां फडफडायीं
मुझे देखा, मुस्कुरायीं...
सुबह सुबह

दिल ने कलेजा थाम लिया
चाँद ने ली अंगडायीं.....
सुबह सुबह

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
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फेसबुक : चेहरों की किताब

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