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शहर बड़ा आलीशान है ये,
पश्चिम की खुली दुकान है ये.

मॉल है मण्डी के कब्र पर,
दरअसल कोई श्मशान है ये.
...
कौन कर रहा है भूखों की बातें,
नंगा साला बेईमान है ये.

चूल्हे नहीं चिता जलाओ,
दिल्ली का यही फ़रमान है ये.

रोज़ का कमा रहा है ३४ रुपये,
लुच्चा भिखारी नहीं, धनवान है ये.

भूखी बस्ती में नयी किलकारी,
चार दिनों की मेहमान है .

तरक्की की राह में आया पीपल,
कटता हुआ भगवान् है ये.

भूखा मर रहा है अन्नदाता,
नयी तरक्की की पहचान है ये.

कफ़न खोल कर हाकिम बोला,
लगता है, हिंदुस्तान है ये.

समझो न इसको अमन 'फ़कीर'
चिंगारी कोई तूफ़ान है ये.

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हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सुनो! मैं बादलों के बादलों से लब लड़ाऊंगा यही ज़िद है कि अब आब से मैं आग पाऊंगा मुझे तुम छोड़ के जो जा रहे हो तो चलो जाओ करूंगा याद ना तुमको, मगर मैं याद आऊंगा थमाया हाथ उसके एकदिन शफ्फाक आईना मिरा वादा था उससे चांद हाथों पर-सजाऊंगा ज़रा देखूं कि अब भी याद आता हूं उसे मैं क्या कि अपनी मौत की अफवाह यारों मैं उड़ाऊंगा लड़ाऊं आंख से मैं आंख, वादा था मिरा उसको अजी पानी नहीं जानां, मैं मय में मय मिलाऊंगा बदन शीशे का तेरा और संगदिल भी तुही जानां तुझे तुझसे बचाऊं तो भला कैसे बचाऊंगा
मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.