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क्या आसमां है ये, ये कैसी ज़मीं है.

क्या आसमां है ये, ये कैसी ज़मीं है.
हर मरासिम चोटिल है, हर रिश्ता ज़ख़्मी है.

कितना बड़ा है तुम्हारा मुट्ठी भर का शहर,
दीवार दीवार से लगी है मगर पडोसी अजनबी है.

उस गाँव में फासला है घरों के दरमयां,
दिल सा एक ही आँगन लेकिन हर कहीं है.

वैसे तो भीड़ लगी रहती है ज़रूरतमंदों की,
ज़रुरत पड़े तो तन्हाई है, कोई नहीं है

तमाम खला, दुनिया तमाम एक ही बैग में,
छोटे कांधों पर इतना बोझ सही नहीं है.

हिंद - पाक, बुश - लादेन, इस्रायल - फलस्तीन साथ उड़ेंगे,
काग़ज़ी जहाज़ बनाने वालों को कितना यक़ीन है.

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मेरी सूरत से वो इस क़दर डरता है. कि न आइना देखता है, न संवरता है. गवाह हैं उसके पलकों पे मेरे आंसू, वो अब भी याद मुझे करता है. दूर जाकर भी भाग नहीं सकता मुझसे, अक्सर अपने दिल में मुझे ढूँढा करता है. ख़ामोश कब रहा है वो मुझसे, तन्हाई में मुझसे ही बातें करता है. मेरी मौजूदगी का एहसास उसे पल पल है, बाहों में ख़ुद को यूँही नहीं भरता है. मेरे लम्स में लिपटे अपने हाथों में, चाँद सी सूरत को थामा करता है. जी लेगा वो मेरे बिन फ़कीर, सोचकर, कितनी बार वो मरता है.
हैं ग़लत भी और जाना रूठ भी सच तभी तो लग रहा है झूठ भी बोझ कब माँ –बाप हैं औलाद पर घोंसला थामे खड़ा है ठूंठ भी खींचना ही टूटने की थी वजह इश्क़ चाहे है ज़रा सी छूट भी दे ज़हर उसने मुझे कुछ यूं कहा प्यास पर भारी है बस इक घूँट भी
सागर से उसको इश्क़ साहिल से नहीं मछली डरे हासिल से मुश्किल से नहीं उसके नगर का तौर है हमसे जुदा घर घर जुड़े हैं हाय दिल-दिल से नहीं सूरज निकलते ही बुझा डाला दिया है बस चमक से इश्क़ काबिल से नहीं वो इश्क़ तो करता है पर शादी नहीं मैं शौक़ से डरता हूँ क़ातिल से नहीं हो बेबसी तो माफ़ है हर इक ख़ता झूठों से डरता हूँ मैं बातिल से नहीं